कैंसर से जंग मे महंगी दवाएं नहीं बनेगीं बाधा : निशि भट्ट

कैंसर से जंग मे महंगी दवाएं नहीं बनेगीं बाधा : निशि भट्ट

नई दिल्ली 

विश्व कैंसर दिवस चार फरवरी के दो दिन पहले यानि एक फरवरी को संसद में पेश किए गए केंद्रीय बजट में मरीजों के लिए राहत भरी घोषणा की गई। कैंसर की दवाओं पर जीएसटी जिसे पहले 12 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत किया गया था, जीएसटी में छूट का फायदा कैंसर तथा दुर्लभ बीमारियों की दवाओं के साथ ही पेंटेंटेड दवाओं पर भी मिलेगा, जिस पर अकसर पेटेंट का हवाला देकर दवा कंपनियां दाम कम नहीं करने की बात कहती हैं। बजट में कैंसर की दवाओं के साथ ही स्वास्थ्य बीमा और कई अन्य मेडिकल उपकरण जैसे गॉज और बैंडेज आदि को भी जीएसटी मुक्त कर दिया गया है। वहीं तंबाकू पर जीएसटी दर 28 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी गई, जिससे अप्रत्यक्ष रूप् से स्मोक और स्मोकलेस तंबाकू का सेवन कम होगा। परिवारों पर बीमारियों के बोझ कम होगा और यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के लिए अग्रसर प्रधानमंत्री जनआरोग्य योजना पीएमजेएवाई पर भी अतिरिक्त कुल व्यय कम हो जाएगा। 
कैंसर और दुर्लभ बीमारियों की जीवन रक्षक दवाओं को जीएसटी मुक्त करने का फैसला जीएसटी काउंसिल की सितंबर महीने की 56वीं बैठक में लिया गया, जिसमें 33 दवाओ (फेफडें के कैंसर की टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, दुर्लभ रक्त विकार, एंजाइम्स रिप्लेसमेंट दवाइयां हीमोफिलिया की दवाएं आदि) को शामिल किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार जीएसटी मुक्त होने के बाद एक महीने में कैंसर की इम्यूनोथेरेपी पर औसतन 45 हजार रूपए तक का कम खर्च होगा। इसको लागू करने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दवा निर्माता कंपनियों पर कड़ी नजर रखने की बात कही है। एम्स में ऑनकोलॉजिस्ट डॉ अभिषेक शंकर कहते हैं कि निम्न एवं मध्यम आय वर्ग समूह के भारत जैसे देश में छूट का लाभ सीधे मरीजों तक पहुंचे, इसलिए प्रत्येक स्तर पर सघन मॉनिटरिंग की जरूरत है। अकसर दवा कंपनियां ब्रांडेड दवाओं का हवाला देकर स्वीकृत शुल्क से अधिक पैसे ले लेती हैं। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यदि जीएसटी छूट का फायदा मरीजों को दवाओं के शुल्क में सीधे तौर पर नहीं मिल रहा तो मरीज जीएसटी काउंसिल या प्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंच सके। 
बजट में इस बार केवल बीमारियों पर ही चर्चा नहीं की गई किसी भी तरह के व्यक्तिगत स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर भी जीएसटी दर जीरो कर दी गई है, जो पहले 18 प्रतिशत तय की गई थी, इससे देश में अधिक से अधिक लोग स्वास्थ्य बीमा के लिए आगे आएगें, प्रीवेंटिव हेल्थ के क्रम में इसे एक सराहनीय कदम माना जा रहा है। भारत की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था पर पीपुल्स रिसर्च प्राइस की रिपोर्ट के अनुसार बेसहारा परिवार प्रति वर्ष एक लाख 25 हजार से कम कमाता है। जबकि निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों की आमदनी एक लाख से पांच लाख तथा पांच लाख से तीस लाख प्रति वर्ष है। इस आधार पर सबके लिए बेहतर स्वास्थ्य की उपलब्धता को देखते हुए स्वास्थ्य बीमा को जीएसटी मुक्त कर दिया गया।  
तंबाकू पर तमाम बड़ी कंपनियों की लॉबिंग को दरकिनार करते हुए सरकार ने केंद्रीय बजट में तंबाकू पर जीएसटी दर 28 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी है, जिससे तंबाकू सबसे अधिक जीएसटी वाला उत्पाद बन गया है। तंबाकू पर कर अधिक लगाने के अनुभवों का बेहतर फायदे को नजीर बनाते हुए जीएसटी स्लैब में बदलाव किया गया, जहां तंबाकू पर जीएसटी दर बढ़ाकर सिगरेट का सेवन छोड़ने या महंगी सिगरेट नहीं खरीदने जैसे तथ्य सामने आए। एक अध्ययन के अनुसार चार भारतीय राज्यों में लागत प्रभावशीलता मॉडल का उपयोग करते हुए पाया गया कि सिगरेट की कीमत में दस रुपए की वृद्धि और दस प्रतिशत का एडवैलोरम होने से उच्च आय वर्ग में तकरीबन 65,762 और निम्न आय वर्ग में 485,725 लोग धुम्रपान छोड़ सकते हैं, जिससे तंबाकू के सेवन से होने वाली 66,50,00 मौतों को टाला जा सकेगा। 
स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि केंद्रीय बजट में देश की जनता के बेहतर स्वास्थ्य के विभिन्न पहलूओं को ध्यान में रखते हुए दूरगामी निर्णय लिए गए। जिसपर यदि हर स्तर पर अमल हो जाएं तो लोगों को कैंसर के इलाज के लिए जमीनें नहीं बेचनी पड़ेगीं, जैसा कि पहले होता आया है।

वरिष्ठ स्वास्थ्य लेखिका

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