प्रौद्योगिकी आधारित वित्तीय सहायता से सशक्त हो रही भारत की नई उद्यमी पीढ़ी
नई दिल्ली।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने भारत की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की तस्वीर पेश की है। देश के एमएसएमई, स्टार्टअप्स और युवा उधारकर्ता अब केवल आर्थिक गतिविधियों के सहभागी नहीं रहे, बल्कि वे विकास, रोजगार और नवाचार की धुरी बनते जा रहे हैं। यह बदलाव उस समय सामने आया है, जब तकनीक आधारित वित्तीय सेवाएं पारंपरिक बैंकिंग की सीमाओं को तोड़ते हुए ज़मीनी स्तर तक पहुंच बना रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रौद्योगिकी-प्रधान लेंडिंग मॉडल ने उन वर्गों के लिए औपचारिक वित्त के दरवाज़े खोले हैं, जो अब तक इससे वंचित थे। स्टैशफिन की सह-संस्थापक श्रुति अग्रवाल का कहना है कि तकनीक के सहारे वित्तीय पहुंच अब अधिक स्मार्ट, तेज़ और समावेशी हो गई है। इससे छोटे उद्यमियों और युवाओं को न केवल पूंजी मिल रही है, बल्कि वे अपने विचारों को ठोस व्यवसाय में बदलने में भी सक्षम हो रहे हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी रेखांकित किया गया है कि जब क्रेडिट वास्तविक ज़रूरतों और आकांक्षाओं के अनुरूप उपलब्ध होता है, तो उसका प्रभाव केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहता। यह आजीविका को मज़बूत करता है, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है और समाज में आर्थिक स्थिरता लाता है। खासतौर पर छोटे शहरों और कस्बों में युवा उद्यमी अब नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनते जा रहे हैं।
जनहित के नजरिये से देखें तो यह बदलाव समावेशी विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, डेटा आधारित क्रेडिट असेसमेंट और आसान ऋण प्रक्रियाएं उन लोगों तक वित्तीय सहायता पहुंचा रही हैं, जो पहले बैंकिंग व्यवस्था से दूर थे। इससे न केवल आर्थिक असमानता कम होने की उम्मीद है, बल्कि एक भविष्य के लिए तैयार, अवसर-प्रधान अर्थव्यवस्था की नींव भी मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस दिशा में नीतिगत समर्थन और पारदर्शिता बनी रही, तो भारत के उद्यमी और युवा उधारकर्ता आने वाले वर्षों में साझा और सतत आर्थिक विकास का नेतृत्व करेंगे। तकनीक और वित्त का यह मेल भारत को आत्मनिर्भर और मजबूत अर्थव्यवस्था की ओर तेज़ी से अग्रसर कर रहा है।
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