होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था से भी है जुड़ा : सत्यवान


होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था से भी है जुड़ा : सत्यवान
- पारंपरिक त्योहारों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं को भी समझना जरूरी

 नई दिल्ली

होली को आमतौर पर बुराई पर अच्छाई की विजय के पर्व के रूप में मनाया जाता है, लेकिन भारतीय परंपराओं में यह त्योहार सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा कृषि रत्न पुरस्कार से सम्मानित दिल्ली देहात के प्र्रगतिशील किसान सत्यवान सहरावत ने होली पर्व को लेकर यह जानकारी दी और कहा कि ग्रामीण समाज में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि कृषि, पशुपालन और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी एक सुदृढ़ परंपरा का हिस्सा रही है। आज जब आधुनिक कृषि विज्ञान और जैव विविधता की बात हो रही है, तब यह आवश्यक है कि हम अपने पारंपरिक त्योहारों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं को भी समझें। होली केवल रंगों और उल्लास का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, कृषि प्रबंधन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी प्रतीक रही है।

- गोबर की ‘ढाल’ और धेनुवान की पहचान
पुरानी मान्यताओं के अनुसार, होली के दिन ग्रामीण क्षेत्र में लोग गोबर से बनी हुई ‘ढाल’ या ‘माला’ पहनते थे। यह केवल प्रतीकात्मक आभूषण नहीं था, बल्कि सामाजिक पहचान का माध्यम भी था। जिस व्यक्ति के पास जितनी अधिक गायें (धेनु) होती थीं, वह उतनी ही ‘ढाल’ धारण करता था। इससे गांव में यह पता चलता था कि कौन कितना ‘धेनुवान’ है। माना जाता है कि ‘धेनुवान’ शब्द कालांतर में बदलकर ‘धनवान’ बन गया, जो संपन्नता का प्रतीक है।

- फसल परीक्षण की परंपरा
होली के अवसर पर किसान अपनी नई फसल - जैसे गेहूं, चना और अन्य अनाज - गांव के सार्वजनिक स्थान पर लेकर आते थे। गांव के अनुभवी और समझदार लोग इन फसलों का निरीक्षण करते थे। वे देखते थे कि किसकी फसल में दानों की संख्या अधिक है, किसका ‘फुटाव’ (उत्पादन गुणवत्ता) बेहतर है और किस फसल में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है।
जिस किसान की फसल सबसे उत्तम पाई जाती, उसे चिन्हित किया जाता था। बाद में गांव के अन्य किसान उसी किसान से बीज लेते थे और बाजार मूल्य से थोड़ा अधिक भुगतान करते थे। इस प्रकार गांव में गुणवत्तापूर्ण बीज का चयन और वितरण सामूहिक रूप से होता था, जिससे कृषि उत्पादन बेहतर होता था।

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